Jagannath Rath Yatra 2026 (Part 2): Complete Guide to Pahandi, Gundicha Temple, Bahuda Yatra, Suna Besha & Niladri Bije
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Jagannath Rath Yatra 2026 (Part 2): Complete Guide to Pahandi, Gundicha Temple, Bahuda Yatra, Suna Besha & Niladri Bije

By Admin 17 Jul 2026

जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 (भाग-2): पहांडी विजय, छेरा पहंरा, गुंडिचा मंदिर, बहुदा यात्रा, सुना वेश और नीलाद्रि बीजे की सम्पूर्ण जानकारी

रथ यात्रा की शुरुआत कैसे होती है?

जगन्नाथ रथ यात्रा केवल रथों को खींचने का उत्सव नहीं है, बल्कि यह कई दिव्य धार्मिक परंपराओं और अनुष्ठानों का संगम है। प्रत्येक अनुष्ठान का अपना आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व है। रथ यात्रा का प्रत्येक चरण भक्तों को भगवान के और अधिक निकट ले जाता है।

पहांडी विजय (Pahandi Bije) क्या है?

रथ यात्रा के दिन सबसे पहले पहांडी विजय की रस्म होती है। इसमें भगवान श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को श्रीमंदिर के गर्भगृह से बाहर लाकर भव्य रथों पर विराजमान कराया जाता है।

इस दौरान सेवायत भगवान की मूर्तियों को विशेष शैली में झूमते हुए आगे बढ़ाते हैं। ढोल, नगाड़ों, शंख, घंटियों और "जय जगन्नाथ" के जयघोष के बीच यह दृश्य अत्यंत दिव्य और भावुक होता है। लाखों श्रद्धालु इस क्षण के दर्शन के लिए घंटों प्रतीक्षा करते हैं।

छेरा पहंरा (Chhera Pahanra) का महत्व

रथ यात्रा की सबसे अनूठी परंपराओं में से एक छेरा पहंरा है।

इस रस्म में पुरी के गजपति महाराज स्वयं भगवान के रथों के सामने सोने की झाड़ू से रथ की सफाई करते हैं और सुगंधित जल का छिड़काव करते हैं।

यह परंपरा यह संदेश देती है कि भगवान के सामने राजा और सामान्य व्यक्ति सभी समान हैं। सेवा और विनम्रता ही सच्ची भक्ति का मार्ग है।

गुंडिचा मंदिर क्यों जाते हैं भगवान?

रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा लगभग तीन किलोमीटर की यात्रा करके गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार गुंडिचा मंदिर को भगवान की मौसी का घर माना जाता है। यहां भगवान लगभग सात दिनों तक विराजमान रहते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं।

एक अन्य मान्यता के अनुसार यही वह स्थान है जहां भगवान श्रीकृष्ण की वृंदावन लीलाओं की स्मृति जीवित रहती है। इसलिए इस यात्रा को प्रेम, भक्ति और मिलन का प्रतीक माना जाता है।

हेरा पंचमी क्या है?

रथ यात्रा के पांचवें दिन हेरा पंचमी का उत्सव मनाया जाता है।

मान्यता है कि जब भगवान जगन्नाथ अपनी बहन और भाई के साथ गुंडिचा मंदिर चले जाते हैं, तब माता लक्ष्मी उन्हें खोजते हुए वहां पहुंचती हैं। भगवान के विलंब से लौटने पर माता लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं।

यह प्रसंग भगवान और माता लक्ष्मी के प्रेमपूर्ण संवाद का प्रतीक माना जाता है और बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है।

बहुदा यात्रा (वापसी यात्रा)

सात दिन बाद भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। इस यात्रा को बहुदा यात्रा कहा जाता है।

बहुदा यात्रा के दौरान भी लाखों श्रद्धालु रथ खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। वापसी के मार्ग में भगवान मौसी मां मंदिर में रुकते हैं, जहां उन्हें पारंपरिक 'पोडा पीठा' का भोग लगाया जाता है।

सुना वेश (Suna Besha)

बहुदा यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत किया जाता है। इस दिव्य श्रृंगार को सुना वेश कहा जाता है।

इस दिन भगवान सोने के मुकुट, हार, हाथों में स्वर्ण आयुध और अन्य बहुमूल्य आभूषण धारण करते हैं। यह वर्ष के सबसे अधिक दर्शनीय उत्सवों में से एक माना जाता है और लाखों श्रद्धालु इस दिव्य स्वरूप के दर्शन करने पहुंचते हैं।

नीलाद्रि बीजे (Niladri Bije)

रथ यात्रा का अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान नीलाद्रि बीजे कहलाता है।

इस दिन भगवान जगन्नाथ पुनः श्रीमंदिर में प्रवेश करते हैं। परंपरा के अनुसार माता लक्ष्मी पहले भगवान का मार्ग रोकती हैं और उनसे नाराजगी व्यक्त करती हैं। भगवान उन्हें प्रसन्न करने के लिए रसगुल्ला अर्पित करते हैं। इसके बाद माता लक्ष्मी मंदिर के द्वार खोलती हैं और भगवान का स्वागत करती हैं।

इसी परंपरा के कारण ओडिशा में इस दिन को रसगुल्ला दिवस के रूप में भी विशेष महत्व दिया जाता है।

रथ यात्रा से जुड़े रोचक तथ्य

  • रथ यात्रा के लिए हर वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं।
  • रथ निर्माण में लोहे की कीलों का बहुत सीमित उपयोग किया जाता है।
  • रथ निर्माण का कार्य अक्षय तृतीया से प्रारंभ होता है।
  • तीनों रथों का आकार, रंग और ध्वज अलग-अलग होते हैं।
  • लाखों श्रद्धालु मिलकर रथ की रस्सियां खींचते हैं।
  • पुरी की रथ यात्रा विश्व की सबसे बड़ी सार्वजनिक धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है।
  • भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद सभी जाति और वर्ग के लोगों को समान रूप से वितरित किया जाता है।
  • रथ यात्रा का सीधा प्रसारण दुनिया के अनेक देशों में देखा जाता है।
  • इस महापर्व में भारत ही नहीं बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु शामिल होते हैं।

रथ यात्रा का आध्यात्मिक संदेश

जगन्नाथ रथ यात्रा हमें यह सिखाती है कि भगवान केवल मंदिरों तक सीमित नहीं हैं। वे स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं और सभी को समान दृष्टि से देखते हैं।

यह महापर्व प्रेम, सेवा, समानता, भाईचारे, करुणा और मानवता का संदेश देता है। रथ की रस्सी खींचना केवल एक धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि भगवान के साथ अपने आध्यात्मिक संबंध को मजबूत करने का प्रतीक माना जाता है।

भक्तों के लिए विशेष मान्यताएं

धार्मिक मान्यता के अनुसार—

  • रथ यात्रा के दर्शन करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • श्रद्धा से रथ की रस्सी खींचने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं।
  • भगवान जगन्नाथ की कृपा से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है।
  • भगवान के महाप्रसाद का सेवन अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • इस पावन यात्रा में शामिल होने से आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

निष्कर्ष (भाग-2)

जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की जीवंत पहचान है। पहांडी विजय से लेकर नीलाद्रि बीजे तक प्रत्येक अनुष्ठान भक्तों को भक्ति, सेवा, विनम्रता और समानता का संदेश देता है। भगवान जगन्नाथ का अपने भक्तों के बीच आना यह दर्शाता है कि ईश्वर सभी के लिए समान हैं और उनकी कृपा पाने के लिए केवल सच्ची श्रद्धा और समर्पण की आवश्यकता होती है।

यदि आपने अभी तक जगन्नाथ रथ यात्रा का अनुभव नहीं किया है, तो जीवन में एक बार पुरी जाकर इस दिव्य महापर्व के दर्शन अवश्य करें। यह यात्रा केवल आंखों से नहीं, बल्कि हृदय और आत्मा से अनुभव की जाने वाली सनातन परंपरा है।

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